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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘यह तो भैया ! वे ही जानें। मैंने जो सुना वह बता दिया है।’’

‘‘पर मित्रता होगी नहीं।’’

बिहारीलाल ने पूछ गम्भीर होकर कह दिया, ‘‘भाभी जैसी देवी का आशीर्वाद निष्फल नहीं जा सकता।’’

‘‘मैं समझता हूँ कि उसने कहा है कि तुम बम्बई के बाजारों में मार्ग भूल जाओ और फिर इतने दुखी होओ कि पुनः यहाँ आने का नाम न लो।’’

‘‘सच? अच्छा देखें किसकी बात ठीक होती है। मैंने ठीक सुना है अथवा तुमने?’’

‘‘पर बिहारी ! यहाँ आये किस काम से हो?’’

‘‘सैर करने। बताओ सैर कराओगे न?’’

तो तुम सैर करोगे? क्या रखा है यहाँ सैर करने को? ऊँचे-ऊँचे मकान और चौड़े, पर भीड़ से भरे बाज़ार। और यहाँ है ही क्या?’’

‘‘मैंने समुद्र कभी नहीं देखा था, सो देखने चला आया हूँ।’’

‘‘क्या होगा उसके देखने से?’’

‘‘मैं भी लखपति बन जाऊँगा।’’

इसपर दोनों हँस पड़े। बिहारीलाल इस समय तक स्नान करने के कपड़े पहन चुका था। रामचन्द उसको स्नानागार के सामने ले जाकर कहने लगा, ‘‘बिहारी ! इसमें स्नान का सामान रखा है। जल्दी-स्तान कर बाहर आ जाना। अल्पाहार तैयार है।’’

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