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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
स्नान कर बिहारीलाल जब अपने कमरे में आया, जहाँ वह अपने कपड़े रख गया था, तो उसने देखा कि उसके पहनने के कपड़े तैयार रखे हैं। उसने कपड़े पहन लिये और कमरे से रखी कुर्सी पर बैठ अपने बम्बई के कार्यकम पर विचार करने लगा। इस समय उसे रामचन्द्र का व्यंग्य स्मरण हो आया। वह समझ गया कि राम उसके आने पर प्रसन्न नहीं है। इसपर भी सेठानी और सेठ के व्यवहार में उसको किसी प्रकार की कमी प्रतीत नहीं हुई थी। वह अपना वहाँ पन्द्रह दिन का कार्यकम बना रहा था। इस समय पन्नादेवी, ललिता और उसकी बहन शकुन्तलादेवी आईं और उसके लिए मिठाई और दूध ले आईं। सब भूमि पर, जहाँ एक कालीन बिछा था, बैठ गई। बिहारीलाल भी कुर्सी से उठकर उनके सामने आ बैठा। मिठाई आदि उसके सामने रखकर पन्नादेवी ने पूछा, ‘‘परीक्षाफल कब तक निकलने वाला है?’’
‘‘इस मास के अन्त तक निकलने की आशा है।’’
‘‘अच्छे नम्बर लेकर पास हो सकोगे?’’
बिहारीलाल ने उत्तर देने के स्थान ललिता की बहन की ओर देखते हुए पूछ लिया, ‘‘आप भाभी की बड़ी बहिन हैं न? आकृति कुछ-कुछ मिलती है।’’
शकुन्तला ने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘भाभी की बहन न भी हुई, तब भी आपकी बहन तो बन सकती हूँ।’’
‘‘पर मैं तो मौसी बनाने की सोच रहा था। बताइये, जीजाजी के कब दर्शन होंगे?’’
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