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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘कदाचित् दो मास में हो सकेंगे। वे यूरोप घूमने गये हैं।’’

‘‘तो आपको साथ नहीं ले गये?’’

‘‘हम अनपढ़ औरतों को कौन पूछता है !’’ शकुन्तला ने कहा और दीर्घ निःश्वास छोड़ दिया।

इसके आगे बिहारीलाल बात नहीं चला सका। उसकी समझ में आ गया कि कोई दुःखद घटना घटी है। वह चुपचाप अल्पाहार करता रहा।

वास्तव में शकुन्तला का पति अपने घर वालों और शकुन्तला, दोनों से लड़कर गया था। बात इस प्रकार हुई थी कि जब करोड़ी-मल ने अपनी छोटी लड़की ललिता का विवाह बिरादरी से बाहर करने का विचार किया तो शकुन्तला का श्वसुर सेठ कुन्दनलाल भगेरिया करोड़ीमल को सबक सिखाने के निए अपने लड़के सुन्दरलाल का नया विवाह करने का आयोजन करने लगा। जब सुन्दरलाल को पता चला कि उसके विवाह की चर्चा होने लगी है, तो उसके मन में नये विवाह की भावना जाग पड़ी। शकुन्तला तो ललिता से भी कुछ अधिक गहरे रंग की लड़की थी और विवाह के दिन से ही वह उसकी रूपरेखा को पसन्द नहीं करता था। परन्तु युवावस्था के उफान में वह पत्नी का त्याग नहीं कर सका और पाँच वर्ष में दो सन्तान हो गईं। यों तो जैसे-तैसे निर्वाह हो रहा था, परन्तु जब उसके माता-पिता ही उसका नवीन विवाह करने की बात करने लगे तो उसके मन में शकुन्तला से अधिक सुन्दर पत्नी पाने की लालसा जाग उठी। उसने अपने पिता को विवाह करने की स्वीकृति दे तो दी, परन्तु यह कह दिया कि विवाह लड़की देखकर करेगा। इसका अर्थ स्पष्ट था कि वह सुन्दर पत्नी की लालसा रखता है।

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