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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


सेठ कुन्दनलाल ने यत्न से एक सम्बन्ध निश्चय किया और उसने वहाँ से भी पाँच लाख दहेज का वचन ले लिया; परन्तु जब सुन्दरलाल ने लड़की देखी तो उसने पसन्द नहीं की। इससे घर में झगड़ा हो गया और इस झगड़े का ज्ञान शकुन्तला को भी हो गया। इस प्रकार तीन ओर से झगड़ा होने लगा। सुन्दरलाल का पिता कहता था, ‘‘मैंने तो दूसरे विवाह का प्रस्ताव करोड़ीमल को मजा चखाने के लिए किया था। तुम्हारे लिए सुन्दर पत्नी लाने के लिए नहीं।’’

इसपर सुन्दरलाल का कहना था, ‘‘मुझको शकुन्तला के बाप में कोई गिला नहीं। मैंने तो नया विवाह इस कारण स्वीकार किया है कि मुझको सुन्दर पत्नी मिल सके।’’

शकुन्तला अपने कुरूप कहे जाने पर रुष्ट हो गई। उसने कह दिया, ‘‘तो जाओ, जहाँ सुन्दर पत्नी मिलती है, वहाँ से ले आओ।’’

इस प्रकार झगड़ा चलने लगा तो सुन्दरलाल को एक उपाय सूझा। उसने चुपचाप यूरोप भ्रमण करने के लिए पासपोर्ट बनवा लिया और जाने की तैयारी कर बैठा। जाते समय वह अपनी तिजोरी की चाबी शकुन्तला को दे गया। उसमें शकुन्तला के आभूषण रखे थे और सुन्दरलाल का अपना, पिता से चोरी रखा हुआ रुपया था। चाबी शकुन्तला को देकर सुन्दरलाल ने कह दिया कि वह अपने माता-पिता का क्रोध शान्त होने के पीछे ही लौटेगा। तबतक वह अपने माता-पिता के घर में रहे।

यद्यपि शकुन्तला को अपने पति के जाते समय उससे सांत्वना मिली थी, इसपर भी उसका यह संशय बना ही हुआ था कि एक बार उसके पति के मन में दूसरी पत्नी का विचार आया है तो यह पूर्ण भी हो सकता है। धनी आदमी को कोई सुन्दर लड़की मिल जानी असम्भव नहीं।

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