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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।

तृतीय परिच्छेद

1

सगाई के उपरान्त ललिता के मन का विकास द्रुत गति से होने लगा। इस विकास में उसके माता-पिता की, उसके विषय में बातचीत ने महत्त्वपूर्ण भाग लिया। ललिता, जब भी उसके माता-पिता, उसके विषय में बात करने लगते, उनके पास से उठकर चली जाती परन्तु छुपकर उनकी बातें सुनने का यत्न करती रहती।

बम्बई आने पर सेठजी के सम्बन्धियों की, ललिता के फकीरचन्द से विवाह के विषय में आपत्तियों पर विचार होने लगा। सम्बन्धियों की आपत्तियों से सेठजी का मत तो विचलित प्रतीत होता था, परन्तु पन्नादेवी सेठजी के मन को दृढ़ करती रहती थी। इसपर भी ललिता देख रही थी कि उसके पिता भारी असमंजस में पड़ गये हैं। इसके उपरान्त मोतीराम की चिट्ठियाँ आने लगीं, जिनमें फकीरचन्द के काम करने के ढंग की आलोचना होती थी। इसपर सेठ फकीरचन्द विपरीत होता जाता था। इस विषय में भी पन्नादेवी युक्ति से सेठ को समझाने का यत्न करती रहती थी। उसका कहना था, ‘‘यदि मोतीराम अथवा गाँव के किसी भी आदमी को काम का ठीक ढँग आता, तो वह स्वयं ही जंगल कटवाकर, उसपर खेती-बाड़ी करवा न लेते? वे कुछ भी न कर सके, यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि फकीरचन्द का ढँग ठीक है और मोतीराम को उसके कहे अनुसार काम करना चाहिए।’’

तदनन्तर जंगल की कटाई का रुपया आने लगा, तो वह आशा से बहुत कम था। इसपर मोतीराम की ओर से शिकायत भी आ रही थी। वह लिखता था कि सेठजी का माल जान-बूझकर सस्ते दाम पर बेच दिया जाता है। इसपर तो सेठ भड़क उठा और वह माल बेचने का कोई पृथक् प्रबन्ध करने का विचार करने लगा।

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