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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
इस समय तक शकुन्तला पर सौकन पड़ने के समाचार आने लगे। ये समाचार शकुन्तला से नहीं मिलते थे। जिन बिरादरीवालों के पास सेठ कुन्दनलाल अपने लड़के का दूसरा विवाह करने को कहता था, वे ही आकर करोड़ीमल के पास सूचना दे जाते थे। करोड़ीमल से ही शकुन्तला को अपने श्वसुर के यत्नों का पता चला था। जब यह झगड़ा बहुत बढ़ गया तो शकुन्तला अपने माता-पिता के घर आ गई और सुन्दरलाल विलायत चला गया।
शकुन्तला के माँ के घर आ जाने से ललिता और शकुन्तला में निकटतम सम्बन्ध बन गये और दोनों अपने-अपने अनुभव एक-दूसरे को बताने लगीं। इससे तो ललिता के मन के विकास में भारी सहायता मिली।
यह अवस्था थी घर की और ललिता के मन की, जब बिहारीलाल बम्बई आया। शकुन्तला ने बिहारीलाल को देखा और इससे तथा अपनी माँ और ललिता से फकीरचन्द के विषय में जाना और इन बातों से ललिता के होने वाले पति का अनुमान लगा लिया। शकुन्तला ललिता के सामने अपने पति और फकीरचन्द की तुलना करने लगी। उसने कहा, ‘‘तुम कहती हो कि जब तुम्हारी सास ने देखा कि उसको एक हजार रुपया सगाई के अवसर पर मिला है, तो उसने उस रुपये को उठाकर सिर से लगाया और तुमको प्यार दिया और तुम्हारा मुख चूम लिया?’’
‘‘हाँ दीदी !’’ ललिता ने बताया, ‘‘एक हजार से ऊपर तो उन्होंने गाँव वालों के खाने-पिलाने में ही व्यय कर दिया था। इसपर भी माँ-बेटे, दोनों के मुख प्रसन्नता से देदीप्यमान हो रहे थे।’’
‘‘ललिता ! तुम बहुत ही भाग्यशाली हो। मैं तुमको अपनी बात बताती हूँ। जब मेरी सगाई हुई थी, तो मेरे श्वसुर शकुन उठाने को तैयार नहीं होते थे, जबतक उनको पाँच लाख का चैक नहीं मिल गया और उन्होंने बैंक को टेलीफोन कर यह जान नहीं लिया कि पिताजी का इतना रुपया बैंक में है। विवाह के बाद तुम्हारे जीजाजी मुझे देख बोल उठे, ‘मुझे मालूम होता कि तुम इस प्रकार के रूपरंग की लड़की हो, तो मैं कभी इस विवाह के लिए तैयार न होता।’’
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