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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘देखो शकुन्तला ! हम तो तिजोरी को तुड़वा भी सकते हैं। अपने घर में हम क्या करते हैं, कौन मना कर सकता है? इसपर भी हम चाहते हैं कि तुम चाबी दे दो, जिससे लोहार को न बुलाना पड़े।’’
‘‘जी नहीं, चाबी तो बिना उनकी लिखित स्वीकृति के दूँगी नहीं। रहा आप क्या कर सकते हैं, इसका मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं।’’
इसका परिणाम यह हुआ कि शकुन्तला का अपनी सास और श्वसुर से रहा-सहा सम्बन्ध भी टूट गया। जबतक सुन्दरलाल यूरोप के भ्रमण से लौटा नहीं, उसके सास-श्वसुर से उसको कोई समाचार नहीं मिला। यों तो शकुन्तला को सुन्दरलाल का भी कोई पत्र नहीं आया था। इसकी चिन्ता तो उसको थी, परन्तु वह इस विषय में कुछ कर नहीं सकती थी। उसको अपने पति का पता विदित नहीं था।
बिहारीलाल को बम्बई में पढ़ने के लिए आये छः मास व्यतीत हो चुके थे। वह कॉलेज होस्टल में रहता था। लगभग प्रति रविवार को वह ललिता, शकुन्तला और सेठजी से मिलने जाया करता था। जब वह आता तो मध्याह्न का भोजन सेठजी के साथ ही किया करता। कई सप्ताह से वह यह अनुभन कर रहा था कि सेठजी का व्यवहार कुछ शुष्क होता जा रहा है। इसपर भी उसको ललिता, शकुन्तला तथा पन्नादेवी के व्यवहार में कुछ भी अन्तर प्रतीत नहीं हुआ।
एक रविवार, जब बिहारीलाल ललिता इत्यादि से मिलने आया हुआ था, एकाएक सुन्दरलाल आ पहुँचा। उसका बिना किसी प्रकार की सूचना के भारत लौट आना और फिर अपनी पत्नी को मिलने चले आना, सबको आश्चर्य में डालने वाला सिद्ध हुआ। पन्नादेवी, शकुन्तलादेवी और ललिता बिहारीलाल के पास बैठी बातचीत कर रही थीं। भोजन की प्रतीक्षा की जा रही थी। सुन्दरलाल आया तो शकुन्तला विस्मय में उठ खड़ी हुई और उसके मुख से निकल गया ‘‘आप?’’
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