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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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जब वे चले गये तो पन्नादेवी ने बिहारीलाल का परिचय दे दिया। उसने बताया, ‘‘यह लड़का ललिता का देवर है। यहाँ बम्बई मे जग्गूमल कॉलेज में पढ़ता है। रविवार के दिन यहाँ आया करता है और हम सबसे मेलजोल रखता है।’’
सुन्दरलाल ने मुख लम्बा कर कहा, ‘‘ओह ! अब समझा हूँ। देखो शकुन्तला ! मैं समझता हूँ कि अब तुमसे निर्वाह नहीं हो सकेगा। तुम मेरी तिजोरी की चाबी दे दो। उसमें रखे तुम्हारे आभूषण मैं पहुँचा दूँगा। रही बच्चों के पालन-पोषण की बात, उस विषय में विचार कर लेंगे। जैसा तुम चाहोगी, वैसा ही प्रबन्ध हो जायेगा।’’
शकुन्तला अवाक् मुख बैठी रह गई। उसकी समझ में नहीं आया कि इस बात से उसके पति का अभिप्राय क्या है। क्या उसने नये विवाह का निश्चय कर लिया है? वह अभी कुछ कह नहीं सकी थी कि सेठ करोड़ीमल वहाँ आ गया। वह भी सुन्दरलाल को देख आश्चर्य करने लगा। उसने पूछा, ‘‘बेटा सुन्दरलाल ! तुमने तो आने की सूचना भी नहीं भेजी? सुनाओ, वहाँ ठीक तो रहे हो?’’
‘‘जी, यहाँ आने की सूचना को छोड़िये, मैंने तो वहाँ पहुँचने की सूचना भी नहीं भेजी थी। न ही वहाँ से किसी प्रकार का पत्र आपको भेजना उचित समझा था। मैं आप लोगों से, जो अपनी लड़की को बिरादरी से बाहर ब्याहने के लिए तैयार है, किसी प्रकार का सम्पर्क रखना नहीं चाहता था।’’
‘‘ललिता की सगाई तो एक व्यापार की चाल थी, वह हो गई। हमारे आपस में वैमनस्य का अब तो वह कारण नहीं हो सकता।’’
‘‘तो क्या आप ललिता का विवाह वहाँ नहीं कर रहे?’’
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