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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘भोजन तो मैं भी नहीं करना चाहता। शकुन्तला ! जाओ, चाबी ले आओ।’’

विवश शकुन्तला गई और अपने कमरे में रखी चाबी ले आई। चाबी देते हुए उसने कहा, ‘‘आप तनिक इधर आइये। मैं आपसे पृथक् में बात करना चाहती हूँ।’’

‘‘वह मैं फिर किसी दिन आकर करूँगा।’’ इतना कह वह अपने स्थान से उठ पड़ा। वह बैठक घर से निकला तो शकुन्तला उसके साथ-साथ ही बाहर आ गई। कमरे से बाहर बरामदे में आकर उसने कहा, ‘‘मैं तो केवल इतना कहना चाहती हूँ कि यदि हमें पृथक् ही होना है, तो क्या यह अच्छा होगा कि एक-दूसरे पर झूठे लाँछन लगाकर हों?’’

‘‘क्या झूठ कहा है मैंने?’’

‘‘आपने न केवल मेरे सतीत्व पर सन्देह किया है, प्रत्युत मेरी कुँवारी बहिन पर भी छींटा उड़ाया है।’’

‘‘तो तुम्हारा विचार है कि उस लौड़े की संगत मधुर नहीं है?’’

‘‘जो कुछ आपका मधुर से अभिप्राय है, वह गलत है।’’

‘‘मैं क्षमा चाहता हूँ।’’

इतना कहकर सुन्दरलाल मकान से नीचे उतर गया। मकान से निकल उसको बिहारीलाल को फुटपाथ पर खड़े देखकर विस्मय हुआ। सुन्दरलाल की मोटर समीप ही खड़ी थी। उसने बिहारीलाल के पास आकर पूछा, ‘‘क्यों भैया ! क्या विचार कर रहे हो?’’

‘‘विचार नहीं कर रहा, टैक्सी की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।’’

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