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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘तो आओ, मेरी मोटर में आ जाओ। कहाँ जहाँ जा रहे हो? मैं छोड़ आता हूँ।’’
‘‘जी नहीं ! क्षमा करें।’’
‘‘रुष्ट हो गये हो? क्या नाम है तुम्हारा? शकुन्तला ने बताया तो था, परन्तु स्मरण नहीं रहा।’’
‘‘जी, मेरा नाम बिहारीलाल है। मैं फकीरचन्द का भाई हूँ। ये वही फकीरचन्द हैं, जो आपके साढ़ू बनने वाले थे और अब नहीं बन सकेंगे?’’
‘‘च...च...। बहुत हानि होगी तुम्हारे भाई को। देखो, मेरे साथ आओ। मैं तुमको एक गुर की बात बताना चाहता हूँ। आओ न। देखो बिहारी ! ये सेठ और सेठ की लड़कियों की बात छोड़ो। तुम अभी बहुत कम आयु के हो और बड़े आदमियों की बातें समझ नहीं सकोगे। आओ, हम आपस में एक-दूसरे को समझ लें। आओ, आओ।’’
टैक्सी कोई आ नहीं रही थी। इस कारण बिहारीलाल ने समझा कि सेठ की गाड़ी में चढ़कर इसकी बात भी सुन ले। अधिक-से-अधिक यह मजाक ही तो उड़ायेगा। देखा जायेगा।
इस कारण वह सुन्दरलाल की गाड़ी में बैठ गया। सुन्दरलाल ने बैठते हुए पूछा, ‘‘कहाँ चलोगे?’’
‘‘होस्टल में।’’
‘‘तो भोजन नहीं करोगे?’’
‘‘होस्टल में कर लूँगा।’’
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