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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।

4

इतना कह सुन्दरलाल ने मोटर ड्राइवर को कह दिया, ‘‘ताज।’’

‘‘ताज होटल?’’ बिहारीलाल ने विस्मय में पूछा। फिर सतर्क हो उसने कहा, ‘‘नहीं साहब ! मैं वहाँ खाना खाने नहीं जा सकता।’’

‘‘देखो, मैं तुमको वहाँ ले जा रहा हूँ। इस कारण मूल्य तुमको देना नहीं पड़ेगा।’’

‘‘मूल्य तो आप दे देंगे, परन्तु वह होटल मेरी सामर्थ्य के बाहर है। मैं वहाँ किसी को ले जाकर खिला नहीं सकता, तो मैं वहाँ जाकर खा भी नहीं सकता।’’

ड्राइवर ने मोटर चला दी थी। इसपर सुन्दरलाल ने कहा, ‘‘यह व्यर्थ की बात है। कौन किसको खिलाता है और कौन खाता है, यह सब तो भगवान् जानता है। छोड़ो इस बात को। मैं यह जानना चाहता हूँ कि इस कँजूस सेठ के पंजे में तुम सीधे-सीधे लोग कैसे फँस गये हो?’’

‘‘देखिये मिस्टर सुन्दरलाल ! आपको विदित होना चाहिए कि मैंने आपका और सेठजी का वार्तालाप कमरे के बाहर खड़े-खड़े सुन लिया है। इस कारण मेरे मन में न तो आपके प्रति और न ही सेठजी के प्रति किसी प्रकार की श्रद्धा उत्पन्न हुई है। आप दोनों एक ही संसार के जीव हैं। रहा हमारा उनके पंजे में फँस जाना, यह तो भविष्य ही बतायेगा। सगाई के समय हमारा कुछ व्यय अवश्य हुआ था, परन्तु ललिता जैसी भाभी को प्राप्त करने के लिए कुछ खर्च करना हमको अखरा नहीं था।’’

‘‘सगाई के समय सेठजी ने आपको कुछ दिया था क्या?’’

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