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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘दिया था, एक हजार रुपया। हमारा खर्च इससे कहीं अधिक हो गया था।’’

‘‘पर अब तो ललिता भाभी नहीं बन रही न?’’

‘‘भैया के भाग्य में इतनी अच्छी पत्नी कदाचित् नहीं है।’’

‘‘बहुत अच्छी है ललिता?’’

‘‘यह मेरा अनुमान है।’’

‘‘चलो छुट्टी हुई। अच्छी अथवा बुरी, जो भी है, अब तो आपके घर में नहीं जायेगी। देखो बिहारी ! मैंने सेठजी की बड़ी लड़की को छोड़ दिया है और तुम्हारे भैया को सेठ जी ने त्याग दिया है। इस प्रकार, मैं समझता हूँ कि हम दोनों एक ही नौका में हैं। मैं अपनी इच्छा से इसमें सवार हुआ हूँ और तुम इस नौका में धकेल दिये गये हो।’’

‘‘इस पर भी हम दोनों में अन्तर हैं।’’

‘‘वह केवल मन की भावना का है।’’

‘‘ऐसी बातों में भावना ही तो मुख्य होती है।’’

‘‘अब तुम्हारे भैया क्या करेंगे?’’

‘‘यह तो वे ही जानें। मैं कैसे बता सकता हूँ?’’

‘‘तुम उनको लिखोगे तो?’’

‘‘मैं समझता हूँ कि मैं न लिखूँ। यह बात मुझसे चोरी कही गई है। मैंने छुपकर सुनी है। सम्भव है कि वह केवल आपको ही सुनाने के लिए हो और कार्य में लाने के लिए न हो?’’

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