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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘तो तुम ऐसी भी आशा करते हो क्या?’’

‘‘आपकी बम्बई के इस समाज में क्या असम्भव हो सकता है?’’

इस समय तक वे ताज होटल के बाहर पहुँच गये थे। यहाँ पहुँच बिहारीलाल ने फिर कहा कि उसको छुट्टी दी जाये; परन्तु सुन्दरलाल ने उसकी बाँह में बाँह डालते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी बातें बहुत मजेदार मालूम होती हैं। इससे तो मेरी इच्छा तुमसे मित्रता करने की और भी अधिक हो गई है। आओ।’’ वह उसको होटल के भीतर ले गया।

होटल में पहुँचकर सुन्दरलाल ने अपनी घड़ी में समय देखा। इस समय साढ़े बाहर बजे थे। सुन्दरलाल ने एक मेज पर बैठते हुए कहा, ‘‘हम तीन यहाँ भोजन कर रहे हैं। तीसरे की प्रतीक्षा है। आओ, तबतक एक पैग...।’’

बिहारीलाल ने कुर्सी पर से उठते हुए कहा, ‘‘जी नहीं। मैं पीता नहीं। कदाचित् मेरी संगत आपके लिए अनुकूल नहीं बैठेगी। इजाजत दें तो मैं जाऊँ?’’

‘‘नहीं, नहीं बैठो। तुम मत पीना, मैं भी नहीं पीता। यह तो केवल तुम्हारे लिए ही लेने लगा था। हाँ, हमारा साथी तो अवश्य पीयेगा। वह यूरोप का रहने वाला है। उनके यहाँ तो यह पानी की भाँति पी जाती है। इसमें हमको आपत्ति नहीं होनी चाहिए।’’

‘‘मुझको किसी दूसरे के पीने में आपत्ति नहीं। मैं तो इसलिए जाना चाहता हूँ कि मेरे कारण आपका मजा फीका हो जायेगा।’’

‘‘यह क्यों? बैठो। यह देखो ‘मीनू’ है। अपने लिए चुन लो।’’

‘‘मेरे लिए भी आप ही चुन दें।’’

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