लोगों की राय

उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

270 पाठक हैं

बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘मैं गो-माँस के अतिरिक्त सब कुछ खा लेता हूँ।’’

‘‘मैं सिवाय वैजिटेरियन खाने के और कुछ नहीं खाता।’’

‘‘कुछ हरज नहीं। ऐसा ही हो जायेगा।’’

इस समय एक लड़की यूरोपियन पोशाक पहने हुए, नीली-नीली आँखों और कटे हुए सुनहरी बालों वाली, वहाँ आई और एक तीसरे आदमी को वहाँ बैठे देख कुछ झिझकी। सुन्दरलाल ने उसको देख कहा, ‘‘सूसन डीयर ! आओ। यह मेरे एक दोस्त हैं। आपसे परिचित कराने के लिए इनको ले आया हूँ।’’

इसके पश्चात् सुन्दरलाल ने बिहारीलाल का परिचय, जैसा वह जानता था, करा दिया। उसने कहा, ‘‘ये देवगढ़ के एक जमींदार के भाई हैं। इनका नाम मिस्टर बिहारीलाल है। इस समय जग्गूमल गूजरमल काँलेज में पढ़ते हैं।

‘‘और,’’ सुन्दरलाल ने लड़की की ओर संकेत कर कहा, ‘‘ये हैं मिस कोमिल्ला सूसन। मुझको फ्रांस के एक गाँव में मिली थीं। ये मेरे साथ यहाँ मेरी पत्नी बनने के लिए चली आई हैं। आप पहले हिन्दूस्तानी है, जिनके साथ मैंने इनका परिचय कराया है। हमारा विवाह शीघ्र ही होगा। इस समय तो मैं इनके लिए एक घर की तलाश में हूँ। यहाँ होटल में कुछ अधिक सुख नहीं है।’’

बिहारीलाल इस सूचना से सुन्दरलाल और मिस सूसन का मुख देखता रह गया। पश्चात् सतर्क हो अपने स्थान से उठकर उसने सूसन से हाथ मिलाते हुए कहा, ‘‘माई गुड विशिज़ आर विद यू मैडम ! डू यू अण्डरस्टैन्ड इंग्लिश? (मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं। आप अँग्रेजी समझती हैं?)’’

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book