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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘हाँ, भली-भाँति।’’ सूसन ने अंग्रेजी में उत्तर दिया।
‘‘और आप मेरे मित्र से बहुत प्रेम करती हैं?’’
‘‘नहीं करती तो इनके पीछे-पीछे इतनी दूर कैसे चली आती?’’
‘‘मैं अपने मित्र की ओर से और अपनी ओर से आपका बहुत ही धन्यवाद करता हूँ। मुझको इस सम्बन्ध से बहुत ही प्रसन्नता होगी।’’
इसके पश्चात् बैरा आया तो खाने का उसको आर्डर दे दिया गया। सुन्दरलाल बिहारीलाल के बात करने के ढँग से बहुत ही प्रसन्न था। उसकी समझ में यह आ गया था कि इसके घर वाले बहुत ही सभ्य लोग हो सकते हैं। बिहारीलाल ने यह बात प्रकट होने नहीं दी थी कि वह सुन्दरलाल से आधा घण्टा पूर्व ही परिचय पा सका है।
भोजन आया। बिहारीलाल ने केवल सब्जी-भाजी ही खाई और सूसन तथा सुन्दरलाल ने माँस-मछली इत्यादि ली। सूसन ने आने से पूर्व एक पैग शैम्पेन भी ली।
सूसन ने भारत के विषय में बहुत-से प्रश्न बिहारीलाल से किये। बिहारीलाल ने बहुत-सी बातों के उत्तर दिये। साथ ही उसने कह दिया, ‘‘मैडम ! हिन्दुस्तान एक बहुत ही बड़ा देश है। इसके विषय में सब-कुछ अपना देखा हुआ ही हो, सम्भव नहीं। मैंने तो अभी इसका एक बहुत ही छोटा-सा भाग देखा है।’’
खाना समाप्त हो गया तो सूसन ने बिहारीलाल ने पूछा, ‘‘आपसे फिर कब और कहाँ भेंट हो सकती है?’’
‘‘मैं कॉलेज में पढ़ता हूँ। आज रविवार होने के कारण खाली था। नित्य तो ऐसा नहीं हो सकता।’’
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