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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘आपके कॉलेज का पता क्या है?’’
इसपर बिहारीलाल ने कॉलेज का पता बता दिया और होस्टल बताते हुए कहा, ‘‘मैं प्रातः दस से सायं चार बजे तक कॉलेज में रहता हूँ और तदुपरान्त या तो सैर करने चला जाता हूँ, अन्यथा होस्टल में।’’
‘‘क्या मैं कभी आपका कॉलेज देखने आ सकती हूँ?’’
‘‘क्या देखेंगी वहाँ? क्लास-रूम में तो कोई जाने देगा नहीं आपको। शेष तो इमारत ही है।’’
‘‘नही; मैं तो आपको देखने आऊँगी।’’
‘‘ओह ! आइये।’’
‘‘आप किसी भी दिन, जब आपको फुर्सत हो, सायं चार बजे यहीं चाय के लिए आ सकते हैं। मुझे प्रसन्नता होगी।’’
‘‘परन्तु आपके लिए तो मकान ढूँढ़ा जा रहा है न?’’
‘‘मुझको यहाँ आये एक सप्ताह हो गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि अभी मकान मिलेगा नहीं।’’
‘‘मिल जायेगा। बम्बई में मकान कठिनाई से ही मिलता है।’’
इसके बाद तीनों उठ पड़े। सूसन होटल के ऊपर की मंजिल में अपने कमरे में चली गई और सुन्दरलाल तथा बिहारीलाल होटल के बाहर आ गये। सुन्दरलाल ने कहाँ, ‘‘बिहारीलाल ! मैं तुम्हारा धन्यवाद करता हूँ कि तुमने आवश्यकता से अधिक कुछ नहीं कहा।’’
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