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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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बिहारीलाल सुन्दरलाल के व्यवहार पर चकित था। सिवाय इस बात के कि वह किसी भी व्यक्ति को सूसन से मिलाने के लिए ले जाना चाहता था, अपने वहाँ ले जाये जाने में वह कोई भी कारण नहीं समझ सका था। एक बात से उसको सन्तोष था कि उसने किसी प्रकार की ऐसी बात नहीं की थी, जिससे उसको लज्जित होना पड़ता।
बिहारीलाल के मस्तिष्क में यह आ भी नहीं सका कि वह सूसन से मिलने के लिए उस होटल में चाय पीने जाये। सूसन भी कहे अनुसार उससे मिलने नहीं आई। वह उसके इस कहने को केवल औपचारिक बात ही समझता था।
बिहारीलाल ने सेठ करोड़ीमल के घर जाने का भी विचार नहीं किया। वैसे तो उसको वहाँ अगले रविवार ही जाना था और अभी आज शनिवार ही था। इस प्रकार इन छः दिनों में उसने अपनी पढ़ाई के अतिरिक्त और किसी ओर ध्यान भी नहीं दिया था। शनिवार कॉलेज दो बजे ही समाप्त हो जाता था और वह उस सांयकाल घूमने निकल जाया करता था। इस शनिवार वह मैरीन ड्राईव पर घूमने के लिए जाने ही वाला था कि सुन्दरलाल उसके कमरे के बाहर आ खड़ा हुआ। बिहारीलाल उसको देख आश्चर्य-चकित रह गया। सुन्दर मुस्करा रहा था। बिहारीलाल ने पूछा, ‘‘आप और यहाँ?’’
‘‘क्यों? हम मित्र नहीं हैं क्या?’’
‘‘मैं तो समझता था कि उस दिन की बात तो, अरेंजमेंट ऑफ कनवीनिएंस (सामयिक सुविधा का प्रबन्ध) मात्र ही था।’’
‘‘नहीं, नही, ‘बिहारीलाल ! मैंने उस दिन भी कहा था कि मुझको तुम्हारी बातों में आनन्द आता है। अब मैं तुमको एक और समाचार देता हूँ कि सूसन को भी तुम्हारी बातों में आनन्द आया था। वह तो उसी दिन से कह रही थी कि तुमको मिलना चाहिए। मैं यह कहकर टाल देता था कि तुमको रविवार से पहले अवकाश नहीं हो सकता। आज उसने तुम्हारे कॉलेज में टेलीफोन कर पता कर लिया कि कॉलेज दो बजे बन्द हो गया है। अतः मुझको टेलीफोन पर कहकर यहाँ ले आई है। अब भैया, तुम चलो। वह बाहर मोटर में प्रतीक्षा कर रही है।’’
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