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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


बिहारीलाल भारी असमंजस में पड़ गया। वह इन्कार नहीं कर सका। यों तो वह कपड़े पहिन भ्रमण के लिए जाने को तैयार ही था। इस कारण उसने पूछ लिया, ‘‘कहाँ चलना होगा?’’

‘‘यह बाहर मोटर से चलकर निश्चय कर लेंगे। देखो, मैं तुमको एक और बात बताना चाहता हूँ। मेरे एक और मित्र है। वे वकील हैं। मैंने उनसे भी सूसन का परिचय कराया था; परन्तु सूसन का कहना है कि वह तो उससे प्रेम प्रकट करने लगा है। इससे उसको उस वकील के बच्चे से घृणा हो गई है। कल वह उसको चाय के समय मिलने गया था। इसपर सूसन, पेट में दर्द का बहाना बनाकर ऊपर अपने कमरे में चली गई। आज उसने कह दिया कि वह उस आदमी का मुख भी देखना नहीं चाहती। इसपर भी तुम्हारी बात दूसरी है।’’

होस्टल के बाहर मोटर खड़ी थी और सूसन उसमें बैठी थी। आज मोटर सुन्दरलाल चला रहा था। सूसन उसके साथ आगे की सीट पर बैठी थी। बिहारीलाल पीछे की सीट पर बैठ गया तो सूसन ‘गुड ईवर्निग’ कह, कुछ, टेढ़ी हो उससे बात करने लगी, ‘‘आप तो फिर आये ही नहीं।’’

‘‘मैंने तो उस दिन ही क्षमा माँग ली थी। मुझको रविवार के अतिरिक्त किसी दिन समय नहीं मिलता।’’

‘‘पर आज तो आप खाली हैं।’’

‘‘इसीलिए तो पकड़ा गया हूँ। अब फरमाइये क्या आज्ञा है?’’

बिहारीलाल ने हँसते हुए कहा।

‘‘मिस्टर भगेरिया तो आपके मित्र हैं ही। मैं चाहती हूँ कि आप मुझसे भी मित्रता का सम्बन्ध बना लें।’’

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