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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


बिहारीलाल ने सूसन को समझाते हुए कहा, ‘‘हमारे यहाँ एक लड़की और लड़के में मित्रता का रिश्ता कुछ अच्छा नहीं समझा जाता। हम भाई बहिन का रिश्ता अधिक पसन्द करते हैं।’’

‘‘पर भाई-बहिन का सम्बन्ध तो एक ही माता-पिता से जन्म होने से ही हो सकता है न?’’

‘‘नहीं, हमारे यहाँ, हिन्दुस्तान में तो कोई लड़की किसी भी हिन्दू युवक को अपना भाई बना सकती हैं। हमारे यहाँ की एक रीति है, उसको रक्षा-बन्धन कहते हैं। उसमें लड़की भी पुरुष के दाहिने हाथ में एक धागा बाँध देती है और वह पुरुष उसको बहिन मान, उसको बहिन के अधिकार दे देता है।’’

‘‘बहुत विचित्र है !’’

‘‘मित्र की अपेक्षा यह नाता मुझको अधिक पसन्द है।’

सूसन मुख देखती रह गई। इसपर सुन्दरलाल ने कह दिया, ‘‘डार्लिग ! बाँध दो न तुम भी इसके हाथ पर एक धागा। इसमें कठिनाई क्या है?’’

‘‘तो ला दीजिये।’’

इसपर बिहारीलाल ने कह दिया, ‘‘मैं तो बिना बाँधे भी इनके प्रति बहिन की भावना रख सकता हूँ।’’

‘‘पर एक बात है। क्या आप एक भाई-बहिन से अधिक-स्नेह का होना सम्भव समझते हैं और मित्रता में वह स्नेह नहीं हो सकता क्या?’’

‘‘भाई-बहिन का सम्बन्ध अधिक पवित्र और अधिक सुदृढ़ होता है।’’

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