लोगों की राय

उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

270 पाठक हैं

बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


इस समय वे मैरीन ड्राईव पर पहुँच गये थे। यह सड़क अभी नई ही बनी थी। इसके एक ओर ऊँची-ऊँची इमारतें और दूसरी ओर समुद्र। यहाँ पहुँच सुन्दरलाल ने मोटर धीमी कर दी। पश्चात् एक ओर मोटर खड़ी कर वे नारियल का पानी पीने लगे। नारियल का पानी पी और खाली नारियल के खोल को एक डस्टबिन में फेंक वे आगे चल पड़े। सूसन का कहना था कि किसी रेस्टोराँ में चलकर चाय लेनी चाहिए।

‘‘तो ताज में चलें?’’ सुन्दरलाल ने पूछा।

‘‘हाँ, चल सकते हैं।’’ सूसन ने कहा।

आज चाय के समय कई विषयों पर बातचीत होती रही। हिन्दू क्या है? एक ईसाई और हिन्दू में क्या अन्तर है? क्या धर्म एक व्यर्थ की बात नहीं? इसका आज के संसार में लाभ ही क्या है? क्या जीवन को भलीभाँति व्यतीत करना ही धर्म नहीं? इस प्रकार की बातें होती रहीं। बिहारीलाल स्वयं भी इस विषय में अधिक नहीं जानता था। उसको जो कुछ भी ज्ञान था, वह अपनी माता के मुख से गीता अथवा उसके उपदेशों को सुनने से ही था। उसने कह दिया, ‘‘हम हिन्दू यह मानते हैं कि एक परमात्मा है। वह संसार को नियन्त्रण मंा रखता है। एक आत्मा है। वह शरीर को ठीक रखने के लिए उत्तरदायी है। शरीर एक भिन्न वस्तु है। शरीर के नाश हो जाने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होता। वह अपने कर्मों के अधीन बार-बार लेता है।’’

‘‘ऐसा मानने में प्रयोजन क्या है?’’

‘‘प्रयोजन को तो मैं जानता नहीं। न ही मैं इस अवस्था में हूँ कि अभी इस प्रयोजन की छान-बीन कर सकूँ। हमारे एक विद्वान् ने एक उपनिषद् में यह लिखा है कि एक पेड़ है। उसपर दो पक्षी बैठे हैं। उनमें से एक पक्षी तो पेड़ के फल खाता है और दूसरा उस पेड़ के फल नहीं खाता। वह सबको देखता रहता है।’’

परन्तु आप इस बात को सत्य मानते हैं?’’

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book