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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘हाँ।’’
‘‘कैसे जानते हैं कि एक परमात्मा है, एक आत्मा है और ये दोनों मरते नहीं?’’
‘‘मैं इनको ऐसे ही जानता हूँ, जैसे यह कि सूर्य पृथ्वी से दस लाख गुणा बड़ा है।’’
‘‘वाह, यह बात तो दूरबीन से दिखाई जा सकती है।’’
‘‘सूसन बहिन ! तुमने देखी है?’’
‘‘नहीं; पर जिन्होंने देखी है, उनके कहे अनुसार मुझको माननी पड़ रही है।’’
‘‘वैसे ही मैंने परमात्मा को देखा नहीं। इस पर भी मैं मानता हूँ कि परमात्मा हैं क्योंकि जिन्होंने परमात्मा को देखा है, उनकी बात मुझको माननी चाहिए।’’
‘‘यह बात तो ठीक नहीं। दूरबीन तो दुनिया में कई स्थानों पर विद्यमान है, जिससे हम सूर्य को देख सकते हैं। परमात्मा को देखने वाली दूरबीन कहाँ लगी हुई है?’’
‘‘देखो सूसन ! एक तो है सूर्य, दूसरा है मलेरिया कीटाणु, तीसरा है एक अणु । अब बताओ, क्या तीनों को एक ही दूरबीन से देखा जा सकता है? हर एक के लिए पृथक-पृथक् प्रकार के साधन होने आवश्यक नहीं क्या? इसी प्रकार परमात्मा को देखने के लिए उपकरण एक विशेष प्रकार का होता है। वह मस्तिष्क मे ही बन सकता है। इस कारण देखने वाले को, परमात्मा को देखने का उपकरण अपने मस्तिष्क में तैयार करना पड़ता है। हम इसको कहते है आध्यात्म-ज्ञान। इसको प्राप्त करने के लिए सबके पास न तो समय है और न ही शक्ति। इस कारण हमको उनकी बात मानने के लिए बाध्य होना पड़ता है, जिनको आध्यत्मिक-ज्ञान उपलब्ध है।’’
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