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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


सूसन युक्ति में परास्त हो गई थी। इसपर भी उसकी समझ में यह नहीं आया था कि आत्मा-परमात्मा को मानने की आवश्यकता क्या है।

यद्यपि बिहारीलाल ने कह दिया था कि परमात्मा को मानने में क्या प्रयोजन है, वह बता नहीं सकता, जैसे सूर्य को पृथ्वी से दस लाख गुणा बड़ा मानने में प्रयोजन प्रतीत नहीं होता। इसपर भी उसने पूछ लिया, ‘‘आप एक व्यर्थ की बात को मानते ही क्यों है?’’

‘‘परमात्मा का अस्तित्व है अथवा नहीं, इसका उपयोगिता से सम्बन्ध नहीं। इसपर भी इतना तो है कि अनेक है, जो अपने जीवन को शुद्ध, पवित्र और नेक बनाने में इस कारण सफल होते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि एक सर्वव्यापक शक्ति है, जो उनको कर्म का फल देने की क्षमता रखती है। केवल मात्र यह विचार कि एक है, जो उनके प्रत्येक काम को सदैव और सर्वत्र देखता रहता है उनको ठीक मार्ग पर रखने में सफल होता है। राज्य की पुलिस और फौज सर्वज्ञ औ सर्वव्यापक नहीं होती। इस कारण उनका भय स्थाई और व्यापक नही हो सकता और अच्छे-से-अच्छे राज्य में भी पाप होते रहते हैं।’’

सूसन इस बात को समझ हँस पड़ी। उसने कह दिया, ‘‘मुझे आपकी बात युक्ति-युक्त प्रतीत नहीं होती।’’

‘‘मुझको इससे हानि प्रतीत नहीं होती। आप मेरी बहिन बनी रह सकती है, चाहे आप परमात्मा को न भी मानें।’’

‘‘मैंने तो सुना था कि हिन्दुस्तान में हिन्दू और मुसलमान मन्दिर में बजने वाले घण्टे पर झगड़ पड़ते हैं और इससे बलवे हो जाते है तथा खून तक हो जाते हैं?’’

‘‘मन्दिर का घण्टा तो एक बहाना होता है। वास्तव में ये झगड़े राजनीतिक प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए होते है।’’

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