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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘यह कैसे?’’

‘‘यह ऐसे ही होता है, जैसे फ्रांस और इंग्लैण्ड में कैथोलिक्स और प्रोटेस्टेन्टों में राज्य प्राप्त करने के लिए होते थे। कुछ लोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए धर्म को राजनीति का आधार बना लेते हैं। वास्तव में वे राजनीति में राजनीतिक सम्बन्धी दल नहीं बना सकते। अतः वे धार्मिक दलों से, जो पहले ही बने हुए हैं, लाभ उठाते हैं।’’

‘‘तो इन धार्मिक दलों को तोड़ क्यों न दिया जाये?’’        

‘‘ये टूट नहीं सकते। कारण यह है कि मनुष्य स्वभाव से सामाजिक जीव है। इससे वह दलबन्दी तो करेगा। जो भी दल बनेगा और जब भी उसका दूसरों पर प्रभुत्व जमाने के लिए प्रयोग होगा, वह हानि करेगा ही। दल तो बनेंगे। यह मनुष्य की प्रकृति में है। होना यह चाहिए कि एक दल दूसरे दल की आधारभूत स्वतन्त्रता को छीने नहीं अर्थात् एक दल दूसरे दल पर, अनुचित प्रभुत्व जमाने का प्रयत्न न करे।’’

इस प्रकार के वार्तालाप में बहुत देर हो गई। इस कारण इसको समाप्त कर तीनों उठ होटल से बाहर आ गये और सुन्दरलाल ने बिहारीलाल को कॉलेज होस्टल में छोड़ दिया। छोड़ने से पूर्व सूसन ने अपने मन की बात कह दी, ‘‘मिस्टर बिहारीलाल ! मैं आज की इस वन्डरफुल बातचीत के लिए आपका धन्यवाद किए बिना नहीं रह सकती। मैं चाहती हूँ कि ऐसे अनेक अवसर मिल सकें।’’

‘‘यह तो आपकी कृपा मात्र ही है कि आप समझती हैं कि मैं इस ‘लाइवली’ बातचीत में कोई कारण था। वास्तव में इसका श्रेय तो आपको ही मिलना चाहिए। रही फिर मिलने की बात। मैं भी इसको चाहता हूँ, परन्तु मैं बम्बई में एक कार्य-विशेष से आया हुआ हूँ। उस कार्य को हानि पहुँचा कर, मैं किसी प्रकार भी आ-जा नहीं सकता।’’

‘‘अच्छी बात है। मैं ही अवसर निकालूँगी।’’

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