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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।

6

इसपर भी बिहारीलाल इन औरतों के झमेले से पृथक् नहीं रह सका। अगला दिन रविवार का था। उसने मन में निश्चय कर रखा था कि जबतक सेठ के घर से उसको निमन्त्रण नहीं आयेगा, वह उसके घर नहीं जायेगा। इस कारण वह प्रातः उठकर स्विमिंग पूल में तैरने चला गया। यह उसका एक प्रिय व्यायाम था। वहाँ से वह दस बजे के लगभग होस्टल में लौटा और प्रातः का अल्पाहार कर पढ़ने बैठ गया। बारह बजे उसने मध्याह्न का भोजन किया और फिर एक घण्टे के लिए विश्राम करने के लिए खाट पर लेट गया।

उसका विचार था कि दो बजे के लगभग उठकर पुनः पढ़ाई करेगा और सायंकाल घूमने चला जायेगा, परन्तु वह अभी सो ही रहा था कि उसके कमरे का दरवाजा खटखटाया गया। उसने लेटे-लेटे ही आवाज दी, ‘‘कौन है?’’

बाहर से आवाज आई, ‘‘दरवाजा खोलिए।’’ यह किसी स्त्री की आवाज थी। उसको सन्देह हो गया कि शकुन्तला हो सकती है। इससे वह लपककर उठा और दरवाजा खोल, बाहर ललिता और शकुन्तला को देख, विस्मय से उनका मुँह देखता रह गया।

उसने पूछा, ‘‘कैसे आई है !’’

‘‘आपसे मिलने के लिए।’’

बिहारीलाल ने अपने कमरे का दरवाजा खोल दिया और उनको कमरे के भीतर बैठाकर पूछने लगा, ‘‘कोई विशेष बात है क्या?’’

‘‘हाँ; हम जानती थीं कि तुम नहीं आओगे। हमें सन्देह है कि पिताजी ने आपके भाई साहब को एक पत्र लिखा है। जिसमें रिश्ता तोड़ने की बातें लिखी है। इस पत्र को लिखे आज पांच दिन हो चुके हैं। हमारा विचार था कि आपको कोई पत्र इस विषय में आया होगा।’’

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