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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


इसको सुन बिहारीलाल को सूसन की याद आ गई। उसने कहा, ‘‘मुझको सुन्दरलाल कल मिले थे। उनकी होने वाली पत्नी के भी दर्शन हुए थे। सुन्दरलाल उस लड़की के सामने मुझे अपना मित्र प्रसिद्ध कर रहा है और वह लड़की मुझको अपना भाई मान रही है।’’

इसपर बिहारीलाल ने उस दिन की पूर्ण बात और पिछले दिन की भी बात शकुन्तला को सुना दी। अन्त में उसने कहा, ‘‘इस सब व्यवहार में कारण क्या है, यह मैं जान नहीं सका।’’

‘‘यह सब विचित्र है !’’ शकुन्तला ने कहा।

‘‘मेरा तो यही कहना है कि भाग्य और भगवान् हमको किसी निर्दिष्ट दिशा में विवश करके ले जा रहा है। हम सिवाय इसके कि अपने भाग्य की धैर्य से प्रतीक्षा करें और कुछ कर ही नहीं सकते।’’

शकुन्तला और ललिता गईं तो बिहारीलाल के मन को इतना दुःख हुआ कि वह घूमने कहीं भी नहीं जा सका। वह पुनः अपने कमरे का दरवाजा भीतर से बन्द कर खाट पर लेट विचार के घोड़े दौड़ाने लगा।

लगभग छः बजे थे। वह अपना मन न तो पढ़ाई में लगा सका था और न ही बाहर घूमने के लिए जा सका था। उसको कुछ ऐसा प्रतीत हो कहा था कि उसके पाँव तले से मिट्टी खिसकती जा रही है। इतना तो उसको विश्वास था कि उसके भाई ने चोरी नहीं की होगी। या तो यह सेठजी का भ्रम है अथवा मोतीराम की कोई नीचता है। इसपर भी वह अपना मन इस बात के लिए तैयार नहीं कर सका कि अपने भाई को यहाँ की सुनी बातें लिखे। इस प्रकार के विचारों में वह लीन था, जब उसके कमरे का दरवाजा फिर खट-खटाया गया। उसने उठकर दरवाजा खोला तो बाहर सूसन को देख आश्चर्य करने लगा।

‘‘चाय पी चुके है?’’ सूसन ने पूछा।

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