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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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बिहारीलाल करोड़ीमल के घर की तलाशी का समाचार जानना चाहता था, परन्तु वह उनके घर पर जाने का विचार नहीं रखता था। उसको विश्वास हो रहा था कि शकुन्तला और ललिता उसको समाचार देने आएँगी। उसका अनुमान ठीक निकला। अगले दिन वह कॉलेज से होस्टल की ओर आ रहा था कि शकुन्तला और ललिता उसके आगे-आगे होस्टल की ओर जाती दिखाई दीं। बिहारीलाल समझ गया कि वे उसको मिलने ही जा रही हैं। इस कारण वह लम्बे-लम्बे डग भरकर उनके साथ जा मिला और उसने धीरे से आवाज दी, ‘‘शकुन्तला बहिन !’’
दोनों ने आवाज सुनी और पहिचानकर खड़ी हो गई। बिहारीलाल ने पूछा, ‘‘किधर जा रही हो?’’
‘‘आपकी ओर जा रही हैं। होस्टल की ओर जाने के स्थान किसी रेस्टोराँ में चलें तो ठीक रहेगा।’’
‘‘बहुत आवश्यकता काम है क्या?’’
‘‘पानी नाक तक आ गया है। ललिता कुछ करने के लिए मन को तैयार कर रही है। इसके पूर्व वह आपसे बात करना चाहती है।’’
‘‘मैं समझा था कि तुम अपने विषय में कुछ सूचना देने आई हो?’’
‘‘वह भी है, परन्तु वह इतनी जल्दी की नहीं है। किधर चलें?’’
बिहारीलाल ने विचार किया कि इनको मैरीन ड्राइव वाले रेस्टोराँ में ले चले और आवश्यकता पड़े तो सूसन को भी वही बुला ले। उसने कहा, ‘‘चलो मैरीन ड्राइव पर एक रेस्टोराँ है। वहीं चलेंगे।’’
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