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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


तीनों फुटपाथ पर ही खड़े हो गये और टैक्सी की प्रतीक्षा करने लगे। टैक्सी आई तो उसपर सवार होकर रेस्टोराँ में आ पहुँचे।

वहाँ बैठते ही शकुन्तला ने पहले अपनी ही कथा सुना दी। उसने कहा, ‘‘कल भगेरिया साहब पिताजी के घर की तलाशी लेने के लिए पुलिस ले आये थे। तलाशी हो गई। वहाँ से निकला तो कुछ नहीं, परन्तु पिताजी की भारी बदनामी हो गई है। जब तलाशी हो रही थी, तब सैकड़ों आदमी घर के बाहर आ खड़े हुए थे। आज तो मिलने-जुलने वालों का ताँता ही लग गया है। सब आते हैं और भगेरिया साहब की निन्दा करते हैं, परन्तु वास्तव में वे पिताजी को लज्जित करने आ रहे हैं।

‘‘इसका अर्थ मैं यह समझती हूँ कि अब मुझको उनकी आशा छोड़ देनी चाहिए। पिताजी भी कहते थे कि अब मेरा उनके घर जाने का तो प्रश्न ही नहीं रहा।

‘‘पर इस समय तो हमें ललिता के विषय में विचार करना है। जब्बलपुर से एक पत्र आया है। पिताजी ने वह पत्र माताजी को दिखाया है और माताजी ने मुझको सुनाया है। मैं, वह पत्र अपने साथ, आपको सुनाने के लिए लाई हूँ। पत्र इस प्रकार है–

‘‘प्रिय सेठजी,

आपका पत्र मिला। यह जानकर चित्त बहुत प्रसन्न हुआ कि आप देवकीनन्दन को अपनी लड़की के लिए पसन्द करते हैं। इस विषय पर और अधिक बात करने से पूर्व यह उचित होगा कि देवकी बम्बई आकर आपकी लड़की को देख ले। यह तो आप जानते ही हैं कि अब वह काल नहीं रहा, जब मेरा और आपका विवाह हुआ था। तब तो माता-पिता जैसा निश्चय कर देते थे, वैसा ही हो जाता था। अब प्रत्येक लड़के के मन में यह अभिलाषा है कि उसकी पत्नी कम-से-कम कुरूप तो न हो।

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