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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘मैं क्या जानूँ? ललिता...।’’ वह कहने लगा था भाभी, परन्तु कहता-कहता रुक गया और कुछ रुककर बोला, ‘मेरा अभिप्राय यह है कि इनको अपना मार्ग स्वयं बनाना चाहिए।’’

इस समय चाय लग गई थी। शकुन्तला ने चाय बनाई। ललिता ने एक घूँट पीकर कहा, ‘‘बिहारी भैया ! मैंने तो अपना मार्ग निश्चय कर लिया है। मैं तो यह जानने आई थी कि क्या तुम और तुम्हारे भैया मेरे अपने मार्ग पर चलने में सहायक होंगे?’’

‘‘तब मार्ग क्या है?’’

‘‘मार्ग सीधा है। मैं इस जब्बलपुर वाले से विवाह नहीं करूँगी।’’

‘‘और भैया से?’’

‘‘यह तुम्हारे भैया पर निर्भर है। विवाह एकपक्षीय बात नहीं हो सकती।’’

‘‘और यदि जब्बलपुर वालों से तुम्हारा विवाह करने में जबरदस्ती की गई तो क्या होगा?’’

‘‘जीवनान्त।’’

बिहारीलाल हँस पड़ा। उसको यह बात केवल डींग मारना ही प्रतीत हुई। ललिता इस हँसी का अर्थ अभी समझने का यत्न ही कर रही थी कि बिहारीलाल ने कह दिया, ‘‘तो ठीक है समय आने दो। भैया की बात तो मैं जानता नहीं। हाँ, अपने विषय में कह सकता हूँ कि मैं तुम्हारे जीवन की रक्षा के लिए जो कुछ भी हो सकेगा, करूँगा।’’

‘‘तुम क्या करोगे?’’ शकुन्तला ने व्यंग्य के भाव में पूछा।

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