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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘इसलिए कि ललिता को एक बार माँ कह चुका हूँ और इस नाते जो कुछ हो सकेगा, करना अपना कर्त्तव्य मानूँगा।’’
ललिता की आँखों में आँसू भर आये थे। वह अपने प्याले की ओर देख रही थी। शकुन्तला ने कह दिया, ‘‘यही तो पूछने हम आये थे।’’
‘‘इसके पूछने की आवश्यकता नहीं थी। जब अपनी एक भावना बन गई, तो वह बन गई। ललिता जी का विवाह कहाँ होता है और कहाँ नहीं होता, इसका मेरी इस भावना से कोई सम्बन्ध नहीं। यों भी ये मुझसे बड़ी हैं और बड़ी बहिन भी तो माँ के बराबर ही होती है।
‘‘देखो शकुन्तला बहिन ! मैं भैया के साप्ताहिक पत्र की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। मैं आशा करता हूँ कि उसमें इस विषय में कुछ तो अवश्य होगा।
‘‘एक बात और है। जब आप यहाँ आई हैं तो वह भी कह देना चाहता हूँ। सुन्दरलाल की भावी पत्नी सूसन मुझको कल फिर मिली थी। उसकी बातों से पता चलता है कि सुन्दरलाल ने उससे, अपने पहले विवाह का जिक्र नहीं किया और जब मैंने बताया कि वह अपने श्वसुर के घर की तलाशी कराने गया है, तो उसको बहुत ही दुःख हुआ था। वह तुमसे मिलना चाहती है। तुम क्या चाहती हो?’’
‘‘क्या लाभ होगा इससे?’’
‘‘और हानि क्या होगी? कुछ समय अवश्य व्यर्थ जायेगा। मेरी राय मानो तो उससे मिलने की स्वीकृति दे दो। परिचय प्राप्त करने से क्या हानि हो सकती है !’’
‘‘कैसे भेंट होगी?’’
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