लोगों की राय

उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

270 पाठक हैं

बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘मैं अभी टेलीफोन पर उसको बुला लेता हूँ और यदि इस समय उसको अवकाश हुआ, तो वह यहीं आ जायेगी।’’

‘‘तो बुला लो।’’ ललिता ने कह दिया।

शकुन्तला विस्मय में ललिता का मुख देखने लगी। ललिता ने कहा, ‘‘दीदी ! होने दो जो होता है।’’

बिहारीलाल ने होटल के टेलीफोन से, सूसन को फोन कर दिया। जब सूसन बोली तो बिहारीलाल ने पूछा, ‘‘क्या इस समय अवकाश है?’’

‘‘हाँ, बिल्कुल खाली हूँ। भगेरिया साहब अभी-अभी चाय लेकर गये हैं। आज उनसे बहुत ही खुलकर बातें हुई हैं। आप कहाँ है मैं आपसे मिलना चाहती हूँ।’’

‘‘मैं कल वाले होटल में बैठा हूँ। मेरे साथ एक और है, जिनसे आप मिलना चाहती थीं। उनकी छोटी बहन भी है।’’

‘‘तब तो मैं अभी आई। आप उनको बिठाइये।’’

पाँच मिनट में सूसन वहाँ आ पहुँची, बिहारीलाल ने दोनों का परस्पर परिचय कराया। सूसन दोनों बहनों के बीच में बैठकर शकुन्तला से पूछने लगी, ‘‘आपको मुझे देखकर दुःख तो बहुत होता होगा?’’

शकुन्तला को सूसन को अंग्रेजी का अनुवाद कर बताने से पहले बिहारीलाल ने कह दिया, ‘‘अग्रेंजी नहीं जानतीं। इस कारण एक द्विभाषिये की आवश्यकता होगी और वह मैं बन रहा हूँ।’’

जब शकुन्तला ने सूसन की बात सुनी तो उसने कहा, ‘‘जब कोई खिलाड़ी खेल में हार जाता है, तो उसको अपने प्रतिद्वन्द्वी को बधाई देनी चाहिए न?’’

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book