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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
दोनों में बिहारीलाल के माध्यम में बातें होने लगीं। शकुन्तला की बात सुन सूसन को विस्मय हुआ और प्रसन्नता भी। उन्होंने कहा, ‘‘मैं आपकी भावना की सराहना करती हूँ, परन्तु यह बात तो माननी ही पड़ेगी कि मैंने आपकी कोई वस्तु छीन ली है।’’
‘‘देखो सूसन बहिन ! हम जीवन को इस प्रकार नहीं समझते। हमारे भाग्य में जो कुछ लिखा है, वही हमको मिलता है। जितना लिखा था, उतना मिल गया और यदि मिलना कुछ शेष है, तो उसको कोई मिलने से रोक नहीं सकता।’’
‘‘तो आप अब क्या करने वाली है? क्या आप तलाक के लिए प्रार्थना करेंगी?’’
शकुन्तला तलाक की बात सुनकर हँस पड़ी। उसने कहा, ‘‘इस बात की हम हिन्दुओं में रीति नहीं है।’’
‘‘तो रीति बना क्यों नहीं लेतीं?’’
‘‘इसलिए कि हम इसको कुछ अच्छी बात नहीं समझतीं। कुछ औरतें है, जो यौन-सम्बन्ध के बिना रह नहीं सकती अथवा जिनको अपने निर्वाह के लिए किसी कमाने वाले पुरुष की आवश्यकता रहती है। वे अपना दूसरा विवाह कर सकती है अथवा बिना विवाह के भी किसी दूसरे पुरुष के पास जाकर रहती है। मुझे इन दोनों बातों की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।’’
इसपर सूसन को चोरी की बात स्मरण हो आई। उसने कहा, ‘‘यदि आपको रुपये की आवश्यकता नहीं, तो आपने चोरी क्यों की है?’’
‘‘मैंने चोरी नहीं की। बात इस प्रकार हुई कि जब वे विलायत जाने लगे, तो मुझको अपने माता-पिता के घर छोड़ने आए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने मुझको अपनी तिजोरी की चाबी दे दी। उससे पहले मैंने कभी उस चाबी को हाथ नहीं लगाया था और न ही मैंने कभी देखा था कि तिजोरी में क्या रखा है। उनकी अनुपस्थिति में मैं उनके घर पर कभी नहीं गई। आने पर उन्होंने वह चाबी मुझसे ले ली। मुझको पता नहीं कि तिजोरी में क्या रखा था और क्या अब निकला है।
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