|
उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
|
270 पाठक हैं |
बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
सूसन के दिमाग में बवण्डर उठ रहा था। वह इस प्रकार की जीवन-मीसांसा को समझ नहीं सकती थी। उसकी शिक्षा-दीक्षा ऐसे वातावरण में हुई थी, जिसमें विवाह को एक कॉन्ट्रैक्ट (वचन-मात्र) समझा जाता था। इस कारण वह इसमे धर्म को घुसेड़ देना पसन्द नहीं करती थी। उसके मुख से अकस्मात् निकल गया, ‘‘हिन्दू इज ए रेस ऑफ ल्यूनैटिक्स (हिन्दू पागलों की एक जाति है)।’’
बिहारीलाल हँस पड़ा, परन्तु उसने इसका अनुवाद कर शकुन्तला को सुनाया नहीं। इसपर शकुन्तला ने ललिता के मुख पर देखा तो उसने इसका अनुवाद कर दिया, ‘‘दीदी ! ये हमको पागल समझती हैं। पर मैं तो इनसे यही कहना चाहती हूँ कि क्या हजरत ईसा को उस समय के यहूदी पागल नहीं समझते थे?’’
सूसन को अब समझ आ गया कि उसने कुछ अनुचित कह दिया है। परन्तु ललिता के उत्तर के पश्चात् सब हँसने लगे। सूसन ने बात बदल दी। उसने कहा, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’
‘‘ललिता।’’
‘‘तुम इनकी बहिन हो इस नाते मेरी भी बहिन हुई।’’
‘‘मुझे स्वीकार है’’
‘‘तो क्या तुम मेरी बात से नाराज हो?’’
ललिता तो अंग्रेजी पढ़ती थी और उसको अंग्रेजी बोलने का अभ्यास भी था। इस कारण उसने बिना बिहारीलाल की सहायता लिए उत्तर दे दिया, ‘‘नाराज नहीं। मैं तो फ्लैटर्ड फील (प्रशंसित अनुभव करती हूँ। विचारों के लिए पागल कहा जाना एक प्रकार की प्रशंसा ही माननी चाहिए।’’
सूसन ने ललिता के गले में बाँह डाककर, उसको अपने समीप खींचकर अपने साथ लगा लिया। इस स्नेह-प्रदर्शन से ललिता का मुख लाल हो गया। इस समय शकुन्तला बिहारीलाल से कह रही थी, ‘‘मुझे उनके इस चुनाव पर शोक नहीं। कम-से-कम मुझसे देखने में तो सुन्दर है।’’
|
|||||

i 









