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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


बिहारीलाल ने कहा, ‘‘शकुन्तला बहिन ! अपना-अपना विचार है। यदि रंग को पृथक कर दें, तुम इससे कम सुन्दर नही हो।’’

शकुन्तला कुछ उत्तर देने ही वाली थी कि सूसन ने उनको अपनी ओर देख, मुस्कराते हुए बातें करते पा कहा, ‘‘मेरी निन्दा हो रही है न?’’

इसपर दोनों हँस पड़े। बिहारीलाल ने हँसकर कहा, ‘‘कह नहीं सकते कि इसको निन्दा कहें अथवा प्रशंसा। वास्तव में दोनों ही बातें हो रही थीं। ये कह रही थी कि आप इनसे अधिक सुन्दर हैं और मैं कह रहा था कि वे आपसे अधिक सुन्दर है। आपका गौर वर्ण ही भ्रम में डालने वाला है।’’

यह सुन तो सूसन का मुख लाल हो गया। यूरोप में किसी लड़की के मुख पर कहना कि वह किसी की तुलना में कुरुप है, उसका अपमान समझा जाता है। बिहारीलाल इस मुख लाल होने का अर्थ नहीं समझा। उसने केवल यह जाना कि सूसन को क्रोध चढ़ आया है। इस कारण उसने डिकन की एक उक्ति कह दी, ‘‘वट हू हैज मेड ऐन ओल्ड बैली ए जज ऑफ ब्यूटी? (मेरे जैसे खूसट को सौन्दर्य का निर्णायक किसने बनाया है?)’’

इसको सुन सूसन हँसते हुए बोली, ‘‘पर आप तो बूढ़े खूसट नहीं?’’

‘‘बात एक ही है। मैंने सौन्दर्य कला सीखी नहीं।’’

इस प्रकार बात टल गई। इसपर सूसन ने उठते हुए कहा, ‘‘शकुन्तला बहिन ! मुझे आपसे मिलकर और आपके विचार जानकर बहुत प्रमन्नता हुई है। मैं चाहती हूँ कि हमारी परम्परा मित्रता अधिक और अधिक बढ़ें। हम फिर कब मिल सकती हैं?’’

ललिता, जो सूसन की बात को सुन और समझ रही थी, बोल उठी. ‘‘यह तो भैया बिहारीलाल के करने की ही बात है।’’

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