|
उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
|
270 पाठक हैं |
बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
8
सूसन को विचार करने के लिए बहुत कुछ मसाला मिल गया था। वह घर गई तो अपने पलंग पर लेट, अपने साथ बीती पूर्ण घटना पर विचार करने लगी। सिनेमा के पर्दे पर चित्र की भाँति, उसकी आँखों के सामने सुन्दरलाल से सम्पर्क की कहानी प्रकाशित हो उठी। वह अपने पिता के अंगूरों के बाग में, एक लता-कुंज में बैठी अपने जीवन पर विचार कर रही थी। उसकी इच्छा विवाह करने की हो रही थी। वह आयु में बाईस वर्ष की हो चुकी थी और बालसार तथा बोकेश्शियों की कहानियाँ पढ़ने में भारी रुचि लिया करती थी। इन कहानियों से उसकी यौन-तृष्णा भड़क उठती थी और वह किसी लड़के की संगत की इच्छा करने लगती थी; परन्तु उसको गाँव में कोई भी लड़का ऐसा दिखाई नहीं देता था, जो उसके मापदण्ड से, उसका पति बनने योग्य होता।
इस समय भूरे रंग का एक व्यक्ति, जिसकी रूपरेखा बहुत ही भली प्रतीत होती थी और जो बहुत ही कीमती कपड़े का सूट पहने हुआ था, उसके सामने आ खड़ा हुआ। यह सुन्दरलाल भगेरिया था और उसके साथ अपना पिता था। उसने सूसन को सम्बोधन कर कहा, ‘‘कौमिल्ला ! ये एक हिन्दुस्तानी मेहमान आए हैं हमारे मित्र कैबिली से परिचय-पत्र लाये हैं। ये कुछ दिन इस गाँव में रहेंगे। क्योंकि ये अंग्रेजी के अतिरिक्त और कोई भाषा नहीं जानते इस कारण मैं इनको तुम्हारे पास लाया हूँ। आशा करता हूँ कि तुम इनकी, इस स्थान पर रहने के दिनों में सहायता कर दोगी।’’
सूसन इस आदमी का मुख आश्चर्य से देखती रह गई और जिस मानसिक अवस्था में वह उन दिनों थी, उसमें उसके लिए सुन्दरलाल से प्रेम करने लग जाना स्वाभाविक ही था।
वह लता-कुंज में से निकल आई और उसने सुन्दरलाल की ओर मुस्कराते हुए देख कहा, ‘‘आइये ! इस घर को आप अपना ही घर समझिये। मैं आशा करती हूँ कि आप इस गाँव में अपनी छुट्टी आनन्दपूर्वक व्यतीत करेंगे।’’
|
|||||

i 









