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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
सुन्दरलाल ने हाथ मिलाते हुए कहा, ‘‘निश्चित ! जब आप मेरा पथ-प्रदर्शन करेंगी। मैं आशा करती हूँ कि आप मुझको उस कष्ट के लिए, जो मैं आपको दूँगा, क्षमा कर देंगी।’’
सुन्दरलाल का सामान इत्यादि अभी तक मकान के ड्राइंग-रूम में पड़ा था। दोनों मकान के पिछवाड़े के एक कमरे में आ गये। यह खाली पड़ा था। सूसन ने बताया, ‘‘यह कमरा मेरे भाई का है। वह आजकल लंदन में है। माँ उसके साथ गई हुई है।’’
उस कमरे में सूसन ने सुन्दरलाल का बिस्तर लगवा दिया और कहा, ‘‘आप अभी आराम कीजिये। चाय के समय आपको बुला लूँगी और फिर उस समय हम यहाँ देखने योग्य स्थानों को देखने का कार्यक्रम बनाएँगे।’’
‘‘मैं अभी से यहाँ के चमत्कार देखने लगा हूँ। मिस कौमिल्ला ! क्या यहाँ सब लड़कियाँ आप जैसी ही सुन्दर हैं?’’
‘‘तो क्या मैं आपको बहुत सुन्दर मालूम हुई हूँ?’’
‘‘स्प्लेंडिड, चार्मिंग।’’
‘‘धन्यवाद। परन्तु आपको विस्मय होगा कि यहाँ पर अभी तक किसी भी युवक ने मुझको ‘प्रपोज’ नहीं किया।’’
वास्तव में यह बात सत्य नहीं थी। वैसे तो गाँव के प्रत्येक युवक ने उससे विवाह की इच्छा प्रकट की थी, परन्तु वह जानती थी कि गाँव में कोई भी ऐसा युवक नहीं, जो जुआ न खेलता हो और जो नित्य राय में पीकर नशे में धुत् न हो जाता हो। वह उन सबसे घृणा करती थी। इसपर भी उसने ऐसा कह दिया, मानो उस गाँव में एक-से-एक सुन्दर लड़की पड़ी हो–‘‘यहाँ तो मैं किसी की दृष्टि में भी जँची नहीं।’’
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