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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘मालूम होता है कि यहाँ के युवको में दृष्टि-दोष है। क्या यहाँ शराब पी जाती है?’’

‘‘तो आप नहीं पीते क्या?’’

‘‘अपने देश में मैंने तो कभी हाथ लगाकर भी नहीं देखी थी। यूरोप में आकर थोड़ी पीनी आरम्भ कर दी है। मैंने अनुभव किया कि पीने से दृष्टि बिखर जाती है और सुन्दर वस्तुएँ भद्दी दिखाई देने लगती है तथा कुरूप वस्तुएँ सुन्दर। कदाचित् यही बात यहाँ के युवकों की हो।’’

‘‘कही, आपने इस समय तो पी हुई नहीं है?’’

‘‘नहीं, मुझे तो पिये आज दो सप्ताह से ऊपर हो गये हैं।’’

उस समय दोनों बातें करते हुए कमरे की खिड़की में आ गये थे और मकान के पीछे का उद्यान देख रहे थे। एकाएक सूसन ने पूछ लिया, ‘‘आपको यह बाग कैसा मालूम होता है?’’

‘‘बहुत सुन्दर है, परन्तु जो फूल इस समय मेरे समीप है, उसकी तुलना तो, उस बाग में कोई भी फूल नहीं कर सकता।’’

‘‘वह देखिये, वह लाल गुलाब का फूल अद्वितीय नहीं है?’’

‘‘गुलाबों में बढ़िया है, परन्तु सब प्रकार के फूलों में तुलना होने पर, उसको तुम्हारे सामने हार माननी पड़ेगी।’’

इतना कहते-कहते सुन्दरलाल ने सूसन का हाथ पकड़ लिया और उसको कुछ जोर से दबा दिया। सूसन समझ गई कि अब उसको पति ढूँढ़ने मे कठिनाई नहीं होगी।

इसके पश्तचात् उसकी घनिष्ठता सुन्दरलाल से बढ़ती गई और सुन्दरलाल के वहाँ से लौटने से पूर्व, दोनों हिन्दुस्तान में चलकर अपने विवाहित जीवन का चित्र बनाने लगे थे।

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