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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


सुन्दरलाल के विदा होने के दिन, सूसन अपने पिता के पास गई और बोली, ‘‘पापा ! तुम मिस्टर भगेरिया के साथ मेरे विवाह के विषय में क्या विचार करते हो?’’

‘‘देखो कौमिल्ला ! तुम अब वयस्क हो। मैं तुमको राय देने का अधिकारी नहीं। इसपर भी मैं इतना कहता हूँ कि यदि इस गाँव का ही कोई युवक होता तो बहुत ठीक रहता।’’

‘‘पापा ! यहाँ ऐसा कौन है, जो शराब नहीं पीता और पीकर धुत् नहीं हो जाता? तुम जानते हो कि मुझके शराबियों से अत्यन्त घृणा है।’’

‘‘यदि तुम दोनों ने निश्चय कर लिया है, तो ठीक है। कब विवाह होगा तुम्हारा?’’

‘‘हिन्दुस्तान में जाकर, हिन्दुस्तानी तरीके से।’’

‘‘कब जा रही हो?’’

‘‘आज ही उनके साथ।’’

‘‘देखो, सावधान रहना चाहिए। कहीं धोखा हुआ तो तुम जानो।’’

इस प्रकार वे वहाँ से चले। भारत में आने की सूचना सुन्दरलाल ने किसी को नहीं भेजी थी।

सुन्दरलाल ने कौमिल्ला सूसन को ताज होटल में ठहराकर ही अपने घरवालों को दर्शन दिये थे। इस कारण उसके घरवालों को पता नहीं था कि वह अपने साथ किसी लड़की को विवाह के लिए लाया है।

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