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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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सुन्दरलाल भगेरिया ने अपने घर वालों को यह कहकर सन्तोष करा दिया था कि वह उनको आश्चर्य में डालना चाहता था, इस कारण उसने सूचना नहीं भेजी थी। इससे उनको सन्तोष नहीं हुआ, हाँ उनको अब अपनी योजना चलाने का समय आया जान पड़ा। सुन्दरलाल के पिता कुन्दनलाल भगेरिया ने उसके पहुँचने के अगले दिन ही कहा, ‘‘देखो बेटा ! अब तुमको अपना काम-धन्धा समेटना चाहिए। यदि शकुन्तला में डरकर देश से भागते रहोगे, तो यहाँ का व्यापार चौपट हो जायेगा।’’
‘‘पर पिताजी ! मैं उसको अपने घर पर नहीं रख सकता।’’
‘‘ठीक है। हम तुम्हें उसको लाने के लिए नहीं कहते। यदि तुम चाहो तो हम तुम्हारी शादी बहुत ही सुन्दर लड़की से कर देंगे।’’
‘‘इस विषय में कुछ दिन के बाद मैं आपसे बात करूँगा। इस समय तो शकुन्तला से पीछा छुड़ाने की बात है।’’
‘‘वह तो सहज में ही हो जायेगा। तुम आज ही अपनी ससुराल में चले जाओ और करोड़ीमल से जाकर कहो कि तुम उनकी लड़की को अपने घर में नहीं रख सकते। उसकी बहन का एक बिरादरी से बाहर और निर्धन आदमी से विवाह हो रहा है। तुम ऐसे कंदलों से अपना सम्बन्ध नहीं रख सकते। करोड़ीमल नहीं मानेगा, क्योंकि उसकी पत्नी नहीं मानती और वह है पत्नी का गुलाम।’’
सुन्दरलाल अपनी ससुराल गया और श्वसुर से झगड़ आया, परन्तु उसको यह जानकर विस्मय हुआ कि करोड़ीमल फकीरचन्द से सम्बन्ध तोड़ने के लिए तैयार बैठा है। इसलिए सुन्दरलाल अब इस सम्बन्ध को तोड़ने का कोई अन्य उपाय ढूँढ़ने लगा। वह बहाना उसको तिजोरी में चोरी हो जाने से मिल गया। उस दिन वह शकुन्तला से चाबी लेकर आया और तिजोरी को खोलकर देखने लगा तो तिजोरी खाली देख उसे क्रोध चढ़ आया। अगले दिन प्रातःकाल ही वह शकुन्तला के पास गया और अपना पचास हजार रुपया माँगने लगा। जब उसने रुपये के विषय में अनभिज्ञता प्रकट की तो सुन्दरलाल ने उसके माता-पिता को गालियाँ देनी आरम्भ कर दीं।
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