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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
इस प्रकार वह अपने उस जीवन का अवलोकन करती हुई पलंग पर लेटी हुई थी, जिसमें उसका सुन्दरलाल से सम्पर्क हुआ था। वह अभी अपने विचार में लीन ही थी कि सुन्दरलाल आ गया और उसको इस प्रकार गम्भीर विचार में लीन देख पूछने लगा, ‘‘डार्लिंग ! क्या हो रहा है?’’
‘‘अपने जीवन की इस घटना पर विचार कर रही हूँ, जिससे आप और मैं, एक ही नौका के यात्री बन गये हैं। मैं एक से आज मिली हूँ, जो यह कहती थी कि यह भाग्य से हुआ है। उसका कहना था कि मेरे भाग्य में अपने पूर्व कर्मों के कारण आपसे सम्पर्क लिखा था, तभी यह हुआ है। मैं मन में विचार कर रही थी कि यह भाग्य क्या है? पूर्व जन्म के कर्म किसने देखे हैं? यह एक घटना-मात्र भी तो हो सकती है। उसका कहना था कि इस घटना से सुख अथवा दुःख होने वाला है। यदि इस घटना को अकारण ही समझ लें, तो इससे होने वाला सुख-दुःख भी अकारण हो जायेगा। इससे, उसका कहना था कि हमको इस संसार के बनाने वाले को अन्यायी कहना पड़ेगा। वह बनाने वाला कोई चेतन-शक्ति है अथवा अचेतन, इस निर्णय के उपरान्त ही उसपर अन्यायी होने का लाँछन लगाया जा सकता है। यदि वह अचेतन है, तब तो दुःख पाने में हम दोषी हैं और यदि चेतन है तो सुख-दुःख देने वाला वह है। उसके अन्यायी होने में कोई कारण नहीं, इसीलिए सुख-दुःख अपने पूर्वकर्मों का फल मानना पड़ेगा।
इतना कहकर सूसन हँस पड़ी। सुन्दरलाल उसकी बात सुनता हुआ अभी तक उसके पलंग के पास ही खड़ा था। सूसन हँसती हुई उठी और उसको लेकर बाहर ड्राइंग रूम में आ गई। सुन्दरलाल जानता था कि सूसन नास्तिक है। इस कारण आज उसको अपने नास्तिक्य पर सन्देह करते देख, आश्चर्य हो रहा था। उसने पूछ लिया, ‘‘मेरी प्यारी सूसन के मन में यह विष भरने का साहस किसको हुआ है?’’
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