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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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यह वही दिन था, जिस दिन सूसन शकुन्तला से मैरीन ड्राईव रेस्टोराँ में मिली थी। उसी मध्याह्नोत्तर, चाय के समय सुन्दरलाल और सूसन में वाद-विवाद हो गया था। इससे पहले दिन सूसन को बिहारीलाल से पता चल गया था कि सुन्दरलाल का एक विवाह पहिले हो चुका है। इस विषय में जब सूसन ने पूछा, तो उसने कहा, ‘‘डार्लिंग ! तुमने कभी इस विषय में पूछा नहीं था और हमारे हिन्दुओं में पुरुष दो-तीन विवाह कर सकता है। यही कारण था कि मैं कह रहा था कि हिन्दू-रीति से विवाह कर लेंगे।’’
‘‘तो तब होगा विवाह?’’
‘‘मैं समझता हूँ कि मेरे और तुम्हारे बीच एक कॉन्ट्रैक्स हो जाना चाहिए। यह तो हिन्दू विवाह से अच्छा ही रहेगा।’’
‘‘क्या कॉन्ट्रैक्ट होगा?’’
‘‘इसका अभिलेख मैं तुमको एक-दो दिन में दे सकूँगा।’’
‘‘मुझको भी वह किसी अपने वकील को दिखाना पड़ेगा।’’
‘‘हाँ, दिखा लेना।’’
इसी सायंकाल सूसन की शकुन्तला से भेंट हो गई। उसको विदित हो गया कि शकुन्तला एक नेक लड़की है और हिन्दू होने से वह दूसरा विवाह नहीं करेगी। इससे भी अधिक शकुन्तला की विवाह तथा जीवन के विषय में विवेचना उसके मन में हलचल मचाने वाली सिद्ध हुई।
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