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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘तो तुमने पत्नी का प्रदर्शन करना है क्या?’’

‘‘सुन्दर वस्तु घर में लाने में हानि क्या है?’’

‘‘धन के समान सुन्दर संसार में और क्या है?’’

‘‘धन तो पिताजी साधन होता है। इससे जीवन में सुविधा और आनन्द उपलब्ध किया जाता है।’’

‘‘यही तो मैं कह रहा हूँ। धन प्राप्त करो और सुन्दर औरतें तुम्हारे आगे-पीछे घूमती फिरेंगी। इसी कारण मैंने ऐसा प्रबन्ध किया है कि सुन्दर पत्नी भी मिलेगी और दो-चार लाख का दहेज भी। तुमने ऐसा आयोजन किया है कि खर्चा-ही-खर्चा होगा और धर्म से पतित भी हो जाओगे।

‘‘देखो सुन्दर ! हमारे परिवार में यह रीति-सी चल गई है कि हमको ससुराल में मिला धन फलता है। मेरी दो शादियाँ हुई थीं और दोनों में दहेज मिला था। उस दहेज से ही बरकत पड़ी थी। तुम्हारे पहले विवाह पर भी तो पाँच लाख मिला था और अब दूसरे विवाह पर भी कुछ-न-कुछ तो मिलना ही चाहिए। इससे घर में ऋषि-सिद्धि आती है। खर्च करने से, विशेष रूप से औरतों पर, तो गरीबी का वास-होता है।’’

‘‘मैं तो उसको छः हजार मील से यह वचन देकर लाया हूँ कि मैं उससे शादी करूँगा। अब अपना वचन भंग कैसे कर सकता हूँ?’’

‘‘देखो प्रत्येक वस्तु का मूल्य होता है। बताओ, उसको यहाँ से वापस कर देने के लिए कितना कुछ देना पड़ेगा?’’

‘‘मैं समझता हूँ कि उससे विवाह कर लेना चाहिए। मैं उसको वचन दे चुका हूँ।’’

‘‘मैंने तो वचन नही दिया न ! यदि तुमने विवाह किया तो मैं तुमको अपने से पृथक कर दूँगा।’’

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