लोगों की राय

उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

270 पाठक हैं

बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘तो वह ईसाई है !’’

‘‘पिताजी ! आप तो जानते हैं कि लड़की की कोई जाति नहीं होती। जिसके घर वह चली जाय, उसकी ही जाति की वह हो जाती है।’’

‘‘मैं जाति की बात नहीं कर रहा सुन्दर ! मैं तो धर्म की बात कर रहा हूँ। उस ईसाई से विवाह करने पर तुम भी ईसाई हो जाओगे।’’

‘‘ऐसा क्यों होगा ! मैं उसको आर्यसमाज में ले जाकर हिन्दू बनवा लूँगा। महाराजा बड़ौदा ने भी तो एक फ्रांसीसी लड़की को हिन्दू बनाकर उससे विवाह कर लिया था।’’

‘‘वह तो राजा है। वह सबकुछ कर सकता है। पर हम ऐसा नहीं कर सकेंगे।’’

‘‘हम किसी से कम धनी हैं?’’

‘‘धन की बात नहीं सुन्दर ! यह तो पदवी की बात है। नही, यह विवाह नहीं होगा।’’

‘‘मैं चाहता हूँ कि कुछ दिन तक इस विषय पर विचार कर लें। लड़की को भी देख लें, तभी अपना निर्णय दें।’’

‘‘मैंने विचार कर लिया है।’’

‘‘फिर भी और विचार करने में कोई हानि है क्या?’’

पिता चुप रहा। इसपर सुन्दरलाल ने कहा, ‘‘तो आप उस लड़की को कब देखने चलियेगा?’’

‘‘क्या जरूरत है जाने की?’’

‘‘पिताजी ! वह बहुत सुन्दर है।’’

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book