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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘कॉन्ट्रैक्स तो मैं अपने वकील को बनाने के लिए दे आया हूँ।’’
‘‘तो उसको बनकर आ जाने दो।’’
‘‘तो क्या तबतक मैं इस अपने ही घर में अजनबी की भाँति रहूँगा?’’
‘‘आप तो इस घर में रह नहीं रहे न?’’
‘‘उसकी ही स्वीकृति तो चाह रहा हूँ।’’
‘‘परन्तु आप तो कुछ और माँग रहे हैं। वह तो विवाह के अथवा कॉन्ट्रैक्ट के पश्चात् ही हो सकता है।’’
‘‘कॉन्टैक्ट में तुम क्या चाहती हो?’’
‘‘मेरे जीवन-काल के लिए प्रबन्ध और यदि कोई सन्तान हो जाये तो उसकी शिक्षा-दीक्षा के लिए प्रबन्ध।’’
‘‘इसके लिए कितना नकद तुम चाहोगी?’’
‘‘मैं क्या जानूँ? इतनी गणना मुझको नहीं आती। आप ही बताइये कि कितने में एक अच्छा जीवन चल जायेगा?’’
‘‘देखो डार्लिंग ! मैं समझता हूँ। यह मकान मैं तुम्हारे नाम से खरीद रहा हूँ। तुम्हारे निर्वाह के लिए पचास रुपए नित्य, जो ताजमहल होटल में रहने का खर्चा है, काफी होगा। मतलब यह कि डेढ़ हजार रुपया महीना अर्थात् अठारह हजार रुपया प्रतिवर्ष चाहिए। इसमें दो हजार रुपये वार्षिक कपड़े इत्यादि के लिए मिला लो। बीस हजार रुपये वार्षिक की आय तुम्हारी हो तो मैं समझता हूँ कि मैंने अपना कर्त्तव्य पालन कर दिया है। इतनी आय करने के लिए चार प्रतिशत के सूद के हिसाब से पाँच लाख रुपये की सम्पत्ति पर्याप्त होगी। यह मैं तुमको कल ही दे सकता हूँ। तुम उसको जहाँ चाहो, सूद पर लगा दो और तुम्हारी बीस हजार की आय होने लगेगी।’’
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