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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
सूसन इतनी धन-दौलत को सुनकर चकाचौंध रह गई। उसने मन में विचार किया कि कॉन्ट्रैक्ट में भी तो यही लिखा जायेगा कि यदि वह उसको घर पर नहीं रखेगा तो अपनी अमुक सम्पत्ति में से इतने रुपये मासिक देगा। यदि इतना कुछ ये एकदम ही दे दें तो फिर चिन्ता की क्या बात हो सकती है?
सूसन के मुख पर प्रसन्नता के लक्षण देख सुन्दरलाल ने सोफा पर, उसके समीप खिसक और उसकी कमर में हाथ डालकर, उसको अपनी ओर घसीटते हुए कहा, ‘‘प्रिये ! अब तो दया करो।’’
सूसन को ऐसे ही एक पूर्व अवसर का स्मरण हो आया। यह उसके पिता के घर में अंगूरों की लता-कुन्ज में था। सूसन वहाँ बालसार की एक कहानी पढ़ रही थी कि सुन्दरलाल कहीं से घूमता हुआ वहाँ आया और उसने उससे मन भरकर प्यार किया था। एक बात का संदेह उसके में मन था और उस घटना के स्मरण आते ही उसको वह संदेह भी स्मरण हो आया। उस घटना के बाद सुन्दरलाल अपने किसी भी वचन को पूरा किये बिना, उससे अधिकाधिक प्रेमोपहार पाने का आग्रह करने लगा था। इसपर उसको संदेह उत्पन्न हुआ कि यदि उसने अब सुन्दरलाल की बात को मानना आरम्भ कर दिया तो रुपया मिलना दूरतम होता जायेगा। इस संदेह के मन में आते ही, उसने अपनी कमर से उसके हाथ को निकाल और कुछ दूर खिसककर कहा, ‘‘अच्छी बात है। आप इतने मूल्य की सम्पत्ति मेरे नाम कर दें तो मैं आपके साथ सदा के लिए सम्बन्ध बना लूँगी।’’
‘‘बहुत ही निर्दयी हो तुम सूसन !’’
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