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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘नहीं जी, इसको निर्दयता नहीं कहते। इसको समझदारी कहा जा सकता है।’’

‘‘ओह ! मैं भूल गया था कि मेरी सूसन बहुत ही समझदार है।’’

‘‘जी हाँ, आइये, अब खाने का समय हो गया है।’’

सुन्दरलाल ने सूसन के लिए दो नौकर रख दिये थे। एक तो औरत थी और दूसरा रसोइया था। रसोइया यूरोपियन और हिन्दुस्तानी, दोनों ढँग का खाना बनाना जानता था। नौकरानी लगभग पचास वर्ष की आयु की थी। वह विधवा थी और उसका लड़का भगेरिया की कपड़ा मिल में नौकरी करता था। रसोइये का नाम था रामू और नौकरानी का नाम था सन्तोषी।

सूसन ने आवाज दी, ‘‘सन्तोषी ! ओ सन्तोषी !!

नौकरानी आई तो उसने कहा, ‘‘डिनर।’’

खाना लगा दिया गया और सुन्दरलाल सूसन के साथ डाईनिंग हॉल में चला गया। भोजन कर वे पुनः ड्राइंग-रूम में आ गये। सुन्दरलाल को सूसन का शकुन्तला से मेल-जोल पसन्द नहीं था, इस कारण उसने उसके विषय में पूछा, ‘‘शकुन्तला और क्या कहती थी?’’

‘‘कुछ विशेष बात नहीं हुई।’’

‘‘मेरी समझ में तो तुमको उसके मिलने की आवश्यकता नहीं हैं।’’

‘‘क्या हानि है उससे मिलने में?’’

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