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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘अभी तो कुछ नहीं हुई, परन्तु न जाने तुम्हारे दिमाग में कोई फितूर समा जाए और मैं घाटे में रह जाऊँ।’’
‘‘परन्तु अभी तक तो उसने मुझको आपसे विवाह न करने के लिए नहीं कहा।’’
‘‘कभी भी कह सकती है।’’
‘‘जब कहेगी, तब विचार कर लूँगी। अभी तक तो वह मुझको आपसे विवाह करने के निश्चय पर बधाई दे रही है।’’
‘‘वह अच्छी औरत नहीं है। वह चोर है।’’
‘‘वह इससे इन्कार करती है।’’
‘‘तो रुपया गया कहाँ?’’
‘‘उसका कहना है कि कदाचित् रुपया वहाँ था ही नहीं और यदि था तो किसी ने ताली लगाकर निकाल लिया होगा। जिस दिन से आप यूरोप गये थे, वह उस घर में गई ही नहीं।’’
‘‘पिताजी का कहना है कि वह एक दिन एक घण्टे के लिए आई थी और चुपचाप चली गई।’’
‘‘बहुत विचित्र है ! देखने में तो उसका मुख इतना भोला-भाला प्रतीत होता है कि कोई कह नहीं सकता कि वह चोर है।’’
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