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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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सुन्दरलाल के साथ उसके पिता की बातचीत हुई तो वह समझ गया कि उसका लड़का अब धन खर्च करने की ओर चल पड़ा है। सुन्दरलाल तो अपने वकील के पास एक कॉन्ट्रैक्ट का मसौदा बनवाने चला गया और पिता बैंक की पास बुक में यह देखने लगा कि रुपये में तो गड़बड़ नहीं की गई। यूरोप जाने में पूर्व सुन्दरलाल ही अपने पिता के स्थान में हिसाब-किताब रखता था और बैंको में लेन-देन करता था। यूरोप जाते समय यह सब बैंको को लिख गया था कि उसकी अनुपस्थिति में बैंको के हिसाब उसके पिता चालू रखेंगे। उसकी अनुपस्थिति में सेठ कुन्दनलाल बैंको के हिसाब चलाता रहा। जब वह वहाँ से लौटा, तो पिता ने सब बैंक वालों को लिख दिया था कि अब सुन्दरलाल यूरोप-भ्रमण से लौट आया है और वह फिर हिसाब चलायेगा।
आज जब उसको पता चला कि वह यूरोप से किसी लड़की को साथ लाया है और उसको कहीं चोरी-चोरी रखे हुए है, तो उसको यह संदेह होना स्वाभाविक ही था कि उसपर रुपया खर्च किया जाता होगा। इस कारण उसने सुन्दरलाल की मेज के दराज से बैंक का हिसाब निकाला, वह यह देखकर चकित रह गया कि उसने अपने नाम पर कई भारी-भारी रकमें निकाली हुई हैं।
उसने कागज लेकर उसपर वे सब रकमें लिख लीं, जो उसने इस काल में, जो यूरोप से लौटने के बाद व्यतीत हुआ था, अपने नाम निकाली थीं। यह देखकर उसको विस्मय हुआ कि वे पचास हजार से ऊपर हैं। यह बात में सन्देह करने में कोई स्थान नहीं था कि यह सब रुपया उसने अपनी प्रेमिका पर व्यय किया है।
उसने मुन्शी से कहकर बैंकों को चिट्ठियाँ लिखवा दीं कि सुन्दरलाल को बैंकों से रुपया निकालने का अधिकार वह वापस लेता है।
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