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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘जब वह उसके साथ इतनी दूर से आई है तो यह बात तो संदेह-रहित ही है कि वह उसकी रखैल है। देखो जी ! आप यह बात मुझ पर छोड़िए, मैं सब बात साफ कर दूँगी। मैं समझती हूँ कि सुन्दर इस बात को मान जायेगा कि उसकी गोरी पत्नी बिना विवाह किये, उसके साथ रहे। हमको आपत्ति नहीं होनी चाहिए।’’
‘‘परन्तु वह मेरी पूर्ण सम्पत्ति उसको दे सकता है। यह मैं नहीं चाहता।’’
‘‘इसका इलाज यह नहीं कि लड़के से लड़ा जाये। उसको समझाने से काम बन जायेगा।’’
‘‘तो ऐसा करो कि उसको समझा दो। उसको यूरोप से आये हुए अभी दो सप्ताह भी नहीं हुए और इस काल में वह पचास हजार रुपया से ऊपर अपने नाम पर निकाल चुका है। इस प्रकार रुपया व्यय करने लगा तो एक वर्ष में ही सबकुछ समाप्त कर देगा।’’
‘‘वह सब रुपया उसने उस लड़की को ही दिया है, यह कैसे कह सकते हैं? आपने उससे पूछा है क्या?’’
‘‘पूछा तो नहीं। इसपर भी इतने रुपये की उसको क्या आवश्यकता पड़ सकती है?’’
‘‘यह भी मैं पूछ दूँगी। मैं यह चाहती हूँ कि उसको रुपया निकालने के अधिकार से वंचित न किया जाए।’’
‘‘यह तो हो गया है। मैंने सब बैंकों को चिट्ठियाँ लिख दी हैं।’’
‘‘ये चिट्ठियाँ अभी रोकी नहीं जा सकतीं क्या?’’
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