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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘बहुत कठिन है।’’
‘‘अच्छी बात है ! उसके खर्चे के लिए रुपया तो उसको देना ही पड़ेगा। मैं नहीं चाहती की बाप-बेटे में मुकद्दमेबाजी आरम्भ हो जाये।’’
‘‘क्या मुकद्दमेबाजी हो सकती है?’’
‘‘यह तो अपने वकील से राय कर लो। सुन्दर को आपके कारोबार में सहायता करते हुए दस वर्ष होने वाले हैं। इतने वर्ष के काम का उसको कुछ तो देना ही पड़ेगा।’’
यह सुन सेठ कुन्दनलाल गम्भीर विचार में पड़ गया। उसने कहा, ‘‘अच्छा मैं वकील से मिलकर अभी आता हूँ, फिर बात करेंगे।’’
सेठ कुन्दनलाल ने घर से ही अपने वकील तवकले साहब को टेलीफोन कर दिया। सैयद महमूद तवकले सेठजी के लेन-देन के मुकद्दमे किया करता था। इस कारण दोनों में बहुत अच्छी घनिष्ठता और घर का-सा व्यवहार था। तवकले साहब ने सेठजी की बात सुनी तो हँसकर कह दिया, ‘‘आप यहाँ चले आइये, टेलीफोन पर इस प्रकार की बातें नहीं हो सकतीं।’’
‘‘क्यों, क्या बात है?’’
‘‘मेरी गुजारिश है कि आप यहाँ आ जाइये, तभी बात हो सकेगी।’’
सेठ कुन्दनलाल मोटर लेकर वकील साहब के मकान पर जा पहुँचा। वहाँ पहुँचते ही वकील साहब ने उसको भीतर बैठक में बुला लिया। सेठ साहब को देख वकील हँसने लगा। हँसकर उसने कहा, ‘‘तो सेठजी ! लड़ पड़े न पुत्र के साथ?’’
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