|
उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
|
270 पाठक हैं |
बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘क्या अब मुझको आपके सम्मुख हाथ पसारना पड़ेगा।’’
‘‘बेटा बाप से जब माँगता है, तो क्या यह हाथ पसारना है?’’
‘‘जब दस वर्ष तक मेरा इतना विश्वास किया कि लाखों रुपये व्यय करने का अधिकार दिया है और अब बैंकों को लिख दिया जाये कि मेरे चैक कैंसिल समझे जाएँ, इस अवस्था में माँगना भीख माँगने के बराबर ही होगा।’’
‘‘नहीं माँगोगे तो क्या करोगे?’’
‘‘अब पिता से बँटवारे के लिए मुकद्दमा लड़ूँगा।’’
‘‘इसपर तो बहुत खर्चा हो जायेगा?’’
‘‘विवश हो करना ही पड़ेगा।’’
‘‘माना कि विवशता है और वह गोरी लड़की तंग कर रही है, पर खर्चा आयेगा कहाँ से?’’
‘‘देखिये पिताजी ! मैंने दस वर्ष तक व्यापार किया है, भाड़ नहीं झौंका। मैंने लगभग एक लाख रुपया मुकद्दमे के लिए निकाल लिया है। मैं समझ गया था कि क्या हो रहा है।’’
‘‘एक लाख ही? चोरी भी की तो केवल एक लाख की?’’
‘‘मैं समझता हूँ कि मुकद्दमे के लिए इतना पर्याप्त है।’’
‘‘और उस छोकरी को खिलाने-पिलाने के लिए?’’
‘‘उसका भी प्रबन्ध कर लिया है।’’
|
|||||

i 









